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सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की रिहाई पर लगाई रोक, चार सप्ताह में जवाब तलब

On: December 30, 2025 4:31 PM
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कुलदीप सिंह सेंगर की रिहाई पर रोक

बीजेपी से निष्कासित पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस आदेश के बाद, आरोपित मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे सेंगर को जेल से रिहा नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें सेंगर की दोषसिद्धि को निलंबित कर दिया गया था। न्यायालय ने सेंगर को नोटिस जारी करते हुए सीबीआई द्वारा दायर याचिका पर चार सप्ताह में जवाब देने की अपेक्षा की है। आगामी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट लोकसेवक की नीतिगत परिभाषाओं और कानूनी व्याख्याओं पर विचार करेगा और इस मुद्दे को स्पष्ट करेगा। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सेंगर की रिहाई पर रोक का आदेश पारित किया। सामान्यतः दोषसिद्धि के निलंबन के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जाता, लेकिन इस मामले में न्यायालय ने विशेष परिस्थिति को देखते हुए हस्तक्षेप किया, क्योंकि आरोपी एक अन्य मामले में भी कारागार में है।

न्यायालय का निर्णय:

सर्वोच्च न्यायालय ने यह चिंता व्यक्त की कि क्या उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 342 के तहत दोषसिद्धि का परीक्षण किया भी था या नहीं। पक्षों की दलीलों के संदर्भ में लोकसेवक की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए—जहाँ एक कांस्टेबल को लोकसेवक माना जा सकता है, वहीं एक विधायक को इससे बाहर रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पक्षों द्वारा किए गए संशोधन न तो सजा बढ़ाने से संबंधित हैं और न ही किसी नए अपराध के निर्माण से जुड़े हैं।

उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि श्रेष्ठ न्यायालय भी गलती कर सकता है और सही समीक्षा ही एकमात्र उपाय है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि धमकाने और कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सुरकान्त, न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने यह आदेश जारी किया।

मामले की पृष्ठभूमि:

इससे पहले, खंडपीठ के समक्ष सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने का आग्रह किया था। अपनी दलील में उन्होंने कहा कि यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के दो हिस्सों के अंतर्गत आता है। सेंगर को संगीन अपराध की श्रेणी में दोषी ठहराया गया है, और 375 की परिभाषा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति प्रभावशाली स्थिति में रहते हुए अपराध करता है, तो सजा 10 वर्ष या आजीवन कारावास तक हो सकती है।

कानूनी जटिलताएं:

न्यायाधीश ने पूछा कि आप कहते हैं कि यह मामला धारा 375 के तहत आता है। यदि पीड़ित नाबालिग नहीं है, तभी 375 की न्यूनतम सजा लागू होगी। जवाब में एसजी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने गलत फैसला दिया है, क्योंकि विधायक धारा 5 के तहत सरकारी कर्मचारी नहीं माना गया। मेहता ने उस फैसले का हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो भी सार्वजनिक पद पर है, जैसे विधायक, उसे सरकारी कर्मचारी माना जाएगा। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या आपका तर्क यह है कि यदि पीड़ित नाबालिग है, तब यह प्रावधान लागू होगा।

एसजी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह नहीं कहा कि आरोपी सरकारी कर्मचारी है या नहीं। हाईकोर्ट ने कहा कि गलती यह है कि जब अपराध हुआ, तब संबंधित सदस्य सार्वजनिक अधिकारी नहीं थे, जिन पर अधिक गंभीर यौन उत्पीड़न के प्रावधान लागू होते। कानून कहता है कि जब पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बल, सार्वजनिक अधिकारी या शिक्षण संस्थान/अस्पताल के कर्मचारी द्वारा यौन उत्पीड़न किया जाता है, तो अपराध गंभीर माना जाता है और कड़ी सजा दी जाती है।

आगे की कार्यवाही व सीबीआई की दलीलें

इस प्रावधान में लोकसेवक की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। संदर्भ के अनुसार, लोकसेवक का अर्थ वह व्यक्ति होगा जो प्रभावशाली या शक्तिशाली स्थिति में हो। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “तो आप कह रहे हैं कि पब्लिक सर्वेंट को व्यापक अर्थ में देखा जाना चाहिए, और संदर्भ के अनुसार, वह कोई भी व्यक्ति हो सकता है जो शक्तिशाली स्थिति में हो।”

इसके बाद न्यायालय ने सीबीआई की दलीलों से सहमति जताते हुए नोटिस जारी किया और उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी। अब मुद्दा यह है कि उच्च न्यायालय ने जिस संदर्भ में आदेश दिया, वहाँ यह स्पष्ट नहीं था कि विशेष अधिनियम के तहत पब्लिक सर्वेंट की परिभाषा कैसे निर्धारित की जानी चाहिए। इसी अस्पष्टता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए आदेश पर रोक लगाई जा रही है, और मामले की विस्तृत व्याख्या आगे की सुनवाई में की जाएगी।

अब देखना यह होगा कि अगली सुनवाई में—जब सेंगर की ओर से जवाब दाखिल होगा और सीबीआई भी अपना पक्ष रखेगी—सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहता है और लोकसेवक की कानूनी परिभाषा को विशेष अधिनियम में किस प्रकार स्पष्ट किया जाता है।

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